हिन्दीयुग हिन्दी साहित्य को इंटरनैट पर एक जगह लाने का एक अव्यावसायिक प्रयास है। इस वैबसाइट पर संकलित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार रचनाकार या अन्य वैध कॉपीराइट धारक के पास सुरक्षित हैं।

लोकप्रिय रचनाएँ

मैं न चुप हूँ न गाता हूँ

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

सवेरा है मगर पूरब दिशा में
घिर रहे बादल
रूई से धुंधलके में

गबन : अध्याय 4

इकतीस

उसी दिन शव काशी लाया गया। यहीं उसकी दाह-क्रिया हुई। वकील साहब के एक भतीजे मालवे में रहते थे। उन्हें तार देकर बुला लिया गया।

कामायनी : चिंता / भाग १

सुख, केवल सुख का वह संग्रह, केंद्रीभूत हुआ इतना,

दूध में दरार पड़ गई

ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया।
बँट गये शहीद, गीत कट गए,

सिपाही

गिनो न मेरी श्वास,
छुए क्यों मुझे विपुल सम्मान?

दुनिया का सबसे अनमोल रत्न

दिलफ़िगार एक कँटीले पेड़ के नीचे दामन चाक किये बैठा हुआ खून के आँसू बहा रहा था। वह सौन्दर्य की देवी यानी मलका दिलफ़रेब का सच्चा और जान देने वाला प्रेमी था।

ब्लॉग से

ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

read more

मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,
मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने ?
काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,
मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने ?

read more

फेसबुक